श्योपुर। जिले के कुछ गांवों में होली से जुड़ी एक अनोखी परंपरा आज भी जीवित है। यहां परंपरा के अनुसार होली का डांडा गाड़ने की रस्म नहीं निभाई जाती। इसके पीछे दशकों पुरानी वह परंपरा है, जिसमें गांव-गांव के बीच होली के डांडे को लेकर वर्चस्व की प्रतिस्पर्धा हुआ करती थी।
होली जहां रंग, उमंग और उत्सव का प्रतीक है, वहीं श्योपुर जिले के कुछ गांवों में यह पर्व एक अनोखी परंपरा की वजह से अलग पहचान रखता है। यहां आधा दर्जन गांव ऐसे हैं, जहां आज भी होली का डांडा नहीं गाड़ा जाता। दरअसल, वर्षों पहले इन गांवों के बीच होली के डांडे को लेकर प्रतिष्ठा की जंग हुआ करती थी। होलिका दहन से पहले ग्रामीण अपने-अपने गांव में डांडा गाड़ते थे, लेकिन पड़ोसी गांव के लोग उसे चुरा ले जाते थे। जिस गांव का डांडा चोरी हो जाता, उसकी होली ‘सूनी’ मानी जाती और वहां होलिका दहन नहीं होता। परंपरा यह बनी कि जब तक अपना डांडा वापस न लाया जाए, तब तक गांव में नया डांडा नहीं गाड़ा जाएगा। समय बीतता गया, लेकिन कुछ गांव अपना डांडा वापस नहीं ला सके। बगहुआ, दूनी सीसवाली, दलारना और तिल्लीपुर जैसे गांव पिछले 73 साल से इसी मान्यता पर कायम हैं। यहां आज भी होली का डांडा नहीं लगाया जाता।
