नेशनल डेस्क। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने राज्य की घटती जनसंख्या को बढ़ाने के लिए नई पहल का ऐलान किया है। इसके तहत तीसरे बच्चे के जन्म पर 30 हजार रुपये और चौथे बच्चे पर 40 हजार रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की गई है। इससे पहले दूसरे बच्चे के लिए 25 हजार रुपये देने की योजना भी सामने आ चुकी है।
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू द्वारा राज्य में घटती जनसंख्या को बढ़ाने के लिए नई जनसंख्या नीति का ऐलान किया गया है। इसके तहत तीसरे बच्चे के जन्म पर 30 हजार रुपये और चौथे बच्चे पर 40 हजार रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की गई है। इससे पहले दूसरे बच्चे के लिए 25 हजार रुपये देने की बात भी कही जा चुकी है।
‘बढ़ती उम्र और घटती जनसंख्या’ पर चिंता- रैली में सीएम नायडू ने कहा कि कई परिवार अब एक या दो बच्चों तक सीमित हो रहे हैं, जिससे राज्य की जनसंख्या वृद्धि दर कम हो रही है। उनका मानना है कि इससे भविष्य में श्रम शक्ति और जनसांख्यिकीय संतुलन पर असर पड़ सकता है। हालांकि, विशेषज्ञों और नीतिगत बहस में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या केवल आर्थिक प्रोत्साहन से जनसंख्या बढ़ाने की नीति सफल होगी, और यदि जनसंख्या बढ़ती है तो “रोटी, पानी और मकान” जैसी बुनियादी जरूरतों का प्रबंधन कैसे होगा।
भारत की जनसंख्या और बदलता रुझान- आंकड़ों के अनुसार, 2011 की जनगणना में भारत की आबादी 121 करोड़ से अधिक थी, जबकि 2001 में यह लगभग 102 करोड़ थी। संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के मुताबिक 2050 तक भारत की आबादी 167 करोड़ तक पहुंच सकती है। दूसरी ओर, फर्टिलिटी रेट में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। जहां 1950 के दशक में प्रति महिला औसतन 6 बच्चे जन्म लेते थे, वहीं 2025–30 के बीच यह घटकर लगभग 2.05 और 2050–55 तक 1.79 तक पहुंचने का अनुमान है। इसका मतलब है कि भविष्य में परिवार छोटे होते जाएंगे।
बढ़ती बुजुर्ग आबादी भी चुनौती- संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। 2022 में जहां लगभग 14.9 करोड़ बुजुर्ग थे, वहीं 2050 तक यह संख्या बढ़कर 34.7 करोड़ तक पहुंच सकती है। इससे सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ने की आशंका है।
लेकिन संसाधनों पर बड़ा दबाव-
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत पहले से ही उच्च जनसंख्या घनत्व वाले देशों में शामिल है। पानी, भोजन और आवास जैसी बुनियादी सुविधाओं पर पहले से दबाव है। संयुक्त राष्ट्र और अन्य एजेंसियों की रिपोर्टों के अनुसार, लाखों लोग अब भी कुपोषण और सुरक्षित पेयजल की कमी जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। इसके अलावा, शहरीकरण बढ़ने के साथ बड़े शहरों में आवास की समस्या भी गंभीर होती जा रही है। अनुमान है कि आने वाले दशकों में करोड़ों नए घरों की जरूरत पड़ेगी।
