धर्म डेस्क। भगवान शिव के प्रिय सावन मास की शुरुआत इस वर्ष 30 जुलाई 2026 से होने जा रही है। इसी के साथ देशभर में प्रसिद्ध कांवड़ यात्रा का शुभारंभ होगा। श्रद्धालु हरिद्वार, गंगोत्री और गौमुख जैसे पवित्र तीर्थों से गंगाजल लेकर अपने-अपने क्षेत्र के शिवालयों तक पहुंचेंगे और भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करेंगे।
सनातन धर्म में सावन माह और कांवड़ यात्रा का विशेष धार्मिक महत्व है। वर्ष 2026 में सावन मास की शुरुआत 30 जुलाई से होगी और इसी दिन से देशभर में कांवड़ यात्रा का शुभारंभ माना जाएगा। यह पावन यात्रा 28 अगस्त 2026 को श्रावण पूर्णिमा तक चलेगी। इस दौरान लाखों शिवभक्त हरिद्वार, गंगोत्री और गौमुख जैसे तीर्थस्थलों से गंगाजल लाकर भगवान शिव का जलाभिषेक करेंगे। कांवड़ यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण दिन 11 अगस्त 2026 को पड़ने वाली सावन शिवरात्रि होगी। इस दिन श्रद्धालु शिवलिंग पर गंगाजल अर्पित कर महादेव का आशीर्वाद प्राप्त करेंगे।
कांवड़ के प्रमुख प्रकार-
सामान्य (पैदल) कांवड़:-
इस कांवड़ को जमीन पर नहीं रखा जाता। श्रद्धालु विश्राम के दौरान इसे कांवड़ स्टैंड पर रख सकते हैं।
खड़ी कांवड़:-
इसे जमीन या स्टैंड पर नहीं रखा जा सकता। विश्राम के समय सहयोगी इसे संभालकर खड़ा रहता है।
दांडी कांवड़:-
सबसे कठिन कांवड़ मानी जाती है। इसमें श्रद्धालु दंडवत करते हुए अपने शरीर की लंबाई से दूरी नापकर यात्रा पूरी करते हैं।
डाक कांवड़:-
इसमें बिना रुके और बिना विश्राम किए लगातार यात्रा की जाती है। श्रद्धालु 24 घंटे के भीतर मंदिर पहुंचने का प्रयास करते हैं।
झांकियों वाली कांवड़:-
भक्तों की टोली वाहन पर भगवान शिव की झांकी सजाकर भजन-कीर्तन और जयकारों के साथ यात्रा करती है।
बाइक कांवड़:-
श्रद्धालु सजाई गई मोटरसाइकिलों से गंगाजल लाकर शिव मंदिरों में जलाभिषेक करते हैं।
झूला कांवड़:-
यह कांवड़ लगातार झूलती रहती है और इसे कभी भी अकेला नहीं छोड़ा जाता।
कांवड़ यात्रा के प्रमुख नियम-
- स्नान किए बिना कांवड़ को स्पर्श नहीं करना चाहिए।
- यात्रा के दौरान तेल, साबुन और कंघी का प्रयोग वर्जित माना जाता है।
- कांवड़ियों को ‘भोला’ और महिला श्रद्धालुओं को ‘भोली’ कहकर संबोधित किया जाता है।
- मांस, मदिरा, तंबाकू और अन्य नशे से दूर रहना चाहिए।
- कांवड़ को किसी पेड़ के नीचे नहीं रखना चाहिए।
- चमड़े से बनी वस्तुओं का उपयोग नहीं करना चाहिए।
- यात्रा के दौरान वाहन पर बैठना निषिद्ध माना जाता है।
- चारपाई पर बैठने या सोने से बचना चाहिए।
- कांवड़ को सिर के ऊपर से ले जाना वर्जित माना गया है।
सावन और कांवड़ यात्रा भगवान शिव की आराधना, तपस्या, अनुशासन और आस्था का प्रतीक मानी जाती है। हर वर्ष लाखों श्रद्धालु कठिन नियमों का पालन करते हुए इस यात्रा में शामिल होकर भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। “बोल बम” और “हर हर महादेव” के जयघोष से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठता है।
