हेल्थ डेस्क। शरीर में चोट लगने पर कई हिस्से प्राकृतिक रूप से खुद को ठीक करने लगते हैं। त्वचा पर कट या खरोंच के बाद नई त्वचा बन जाना इसका सामान्य उदाहरण है। लेकिन शरीर के सभी अंगों में खुद को रिपेयर करने की क्षमता समान नहीं होती। कुछ अंगों और टिश्यू में गंभीर या स्थायी नुकसान होने के बाद उन्हें पहले जैसी स्थिति में पूरी तरह वापस लाना आज भी मेडिकल साइंस के लिए चुनौती है। हालांकि, क्षतिग्रस्त अंग के काम करने की क्षमता में उपचार और रिहैबिलिटेशन के जरिए सुधार संभव है।
शरीर में चोट लगने के बाद खुद को ठीक करने की अद्भुत क्षमता होती है। त्वचा पर कट या खरोंच लगने के बाद कुछ समय में नई त्वचा बन जाती है। शरीर के कई अन्य हिस्सों में भी क्षतिग्रस्त कोशिकाओं की मरम्मत होती है, लेकिन यह क्षमता हर अंग में एक जैसी नहीं होती। कुछ अंगों और ऊतकों में गंभीर या स्थायी नुकसान होने के बाद शरीर खोए हुए टिश्यू को पहले जैसी स्थिति में पूरी तरह नहीं बना पाता। हालांकि, इसका यह मतलब भी नहीं है कि संबंधित अंग तुरंत काम करना बंद कर देता है। कई मामलों में शरीर बचे हुए स्वस्थ हिस्से की मदद से काम जारी रखता है और इलाज व रिहैबिलिटेशन से कार्यक्षमता में सुधार संभव होता है।
दिल की मांसपेशियों को नुकसान:- हार्ट अटैक के दौरान लंबे समय तक रक्त और ऑक्सीजन की आपूर्ति बाधित होने पर दिल की मांसपेशियों की कोशिकाएं यानी कार्डियोमायोसाइट्स मर सकती हैं। वयस्कों में इन कोशिकाओं के बड़े पैमाने पर दोबारा बनने की क्षमता बहुत सीमित होती है। क्षतिग्रस्त हिस्से में स्कार टिश्यू बन सकता है, जिससे दिल की पंपिंग क्षमता प्रभावित हो सकती है। हालांकि समय पर उपचार, दवाओं, जीवनशैली में बदलाव और कार्डियक रिहैबिलिटेशन से बचे हुए स्वस्थ हिस्से को बेहतर ढंग से काम करने में मदद मिल सकती है।
दिमाग के न्यूरॉन्स की क्षति:- ब्रेन स्ट्रोक या गंभीर सिर की चोट में न्यूरॉन्स और उनके बीच के कनेक्शन प्रभावित हो सकते हैं। वयस्क मस्तिष्क में मृत न्यूरॉन्स और पुराने कनेक्शन को हूबहू दोबारा बनाना बेहद सीमित होता है। फिर भी दिमाग में न्यूरोप्लास्टिसिटी की क्षमता होती है, जिसके जरिए बचे हुए न्यूरल नेटवर्क कुछ कार्यों को नए तरीके से संभाल सकते हैं। इसी कारण फिजियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी और अन्य रिहैबिलिटेशन से कई मरीजों में सुधार देखा जा सकता है।
रीढ़ की नसों की चोट:- स्पाइनल कॉर्ड दिमाग और शरीर के बीच संदेश पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसकी गंभीर चोट के बाद क्षतिग्रस्त नसों के कनेक्शन को पहले जैसा बनाना कठिन होता है। गंभीर चोट के बाद हाथ-पैरों में कमजोरी, चलने में परेशानी या संवेदना में बदलाव जैसी समस्याएं लंबे समय तक रह सकती हैं। हालांकि नियमित रिहैबिलिटेशन और फिजियोथेरेपी से उपलब्ध नर्व नेटवर्क का बेहतर इस्तेमाल करने में मदद मिल सकती है।
कार्टिलेज की मरम्मत मुश्किल:- जोड़ों में मौजूद आर्टिकुलर कार्टिलेज हड्डियों के बीच कुशन का काम करता है। इसमें रक्त की आपूर्ति सीमित होने के कारण इसकी प्राकृतिक मरम्मत क्षमता कम होती है। छोटी चोट में कुछ हद तक सुधार संभव है, लेकिन गहरी या बड़ी क्षति आमतौर पर पहले जैसी नहीं बनती। कार्टिलेज के लगातार घिसने से दर्द, अकड़न और चलने-फिरने में परेशानी हो सकती है।
किडनी के नेफ्रॉन नहीं बनते दोबारा:- किडनी में मौजूद नेफ्रॉन खून को फिल्टर करने वाली प्रमुख कार्यात्मक इकाइयां हैं। वयस्क व्यक्ति में पूरी तरह नष्ट हुए नेफ्रॉन दोबारा नहीं बनते। हालांकि किडनी की कुछ कोशिकाएं चोट के बाद रिपेयर कर सकती हैं और बचे हुए नेफ्रॉन अतिरिक्त काम करके किडनी की कार्यक्षमता को कुछ समय तक संभाल सकते हैं। लेकिन लंबे समय तक बीमारी या गंभीर नुकसान में बड़ी संख्या में नेफ्रॉन नष्ट होने पर खोई हुई संरचना को वापस पाना संभव नहीं होता।
फेफड़ों की स्थिति अलग:- फेफड़ों में कुछ हद तक रिपेयर और रीजेनेरेशन की क्षमता होती है। लेकिन फेफड़ों में लंबे समय तक रहने वाला फाइब्रोसिस या एम्फिसीमा जैसी स्थितियों में हुआ संरचनात्मक नुकसान पूरी तरह वापस नहीं आ सकता। इसलिए फेफड़ों को होने वाली गंभीर क्षति को समय रहते रोकना और बीमारी का उपचार शुरू करना महत्वपूर्ण है।
लिवर में होती है बेहतर रीजेनेरेशन क्षमता:- शरीर के सभी अंगों की तुलना में लिवर की खुद को दोबारा बनाने की क्षमता काफी बेहतर मानी जाती है। चोट या सर्जरी के बाद लिवर अपने आकार और कार्य को काफी हद तक वापस पाने में सक्षम हो सकता है। यही कारण है कि अलग-अलग अंगों की रिकवरी क्षमता को एक ही नजरिए से देखना सही नहीं है।
इलाज में देरी पड़ सकती है भारी:- शरीर की मरम्मत की क्षमता इस बात पर निर्भर करती है कि किस अंग को कितना नुकसान हुआ है, क्षति किस हिस्से में हुई है और उपचार कितनी जल्दी शुरू किया गया। हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक, गंभीर सिर या रीढ़ की चोट और किडनी से जुड़ी गंभीर समस्या में समय पर चिकित्सकीय जांच और उपचार बेहद महत्वपूर्ण है। केवल घरेलू उपचार या खुद से दवा लेने के बजाय विशेषज्ञ की सलाह लेना जरूरी है।
