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ईरान पर करेंगे हमला या पीछे खींचेंगे कदम… युद्ध को लेकर ट्रंप प्रशासन में मतभेद!

By: गणेश शाह संपादक

On: Sunday, February 22, 2026 9:05 AM

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ट्रंप प्रशासन की विदेश नीति: एक अवलोकन

ट्रंप प्रशासन की विदेश नीति के कई प्रमुख तत्व थे, जिनमें से एक महत्वपूर्ण पहलू ईरान के प्रति उनके उग्र दृष्टिकोण था। ट्रंप ने ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते, जिसे औपचारिक रूप से ज्वाइन्ट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन (JCPOA) कहा जाता है, को समाप्त करने का निर्णय लिया। यह कदम उनके प्रशासन की नीति को उस समय के अन्य प्रशासनों से अलग करता है, जहां बातचीत और कूटनीति पर जोर दिया गया था। ट्रंप प्रशासन ने अपने दृष्टिकोण को “मैक्सिमम प्रेशर” नीति के तहत लागू किया, जिसका उद्देश्य ईरान को आर्थिक रूप से कमजोर करना और उसकी क्षेत्रीय प्रभाव को सीमित करना था।

ईरान के प्रति इस अपेक्षाकृत आक्रामक दृष्टिकोण के पीछे एक रणनीतिक सोच थी। ट्रंप का मानना था कि तेहरान की कार्रवाइयाँ न केवल मध्य पूर्व में स्थिरता को नुकसान पहुंचाती हैं, बल्कि यह अमेरिका के समक्ष एक गंभीर खतरा भी प्रस्तुत करती हैं। प्रशासन ने आमतौर पर ईरान को एक “आक्रामक शक्ति” के रूप में चित्रित किया है, जिसने अन्य देशों में आतंकवाद और अस्थिरता को बढ़ावा दिया। इसलिए, ट्रंप प्रशासन ने ईरान के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंधों को लागू करना शुरू किया, जिससे इसकी अर्थव्यवस्था को काफी नुकसान हुआ।

हालांकि, इस नीति का आलोचना के साथ सामना करना पड़ा। कई विश्लेषकों ने तर्क किया कि “मैक्सिमम प्रेशर” रणनीति अंततः विफल हो गई, क्योंकि इसने ईरान के साथ वार्ता के लिए अवसरों को सीमित कर दिया। कुछ विशेषज्ञों का मानना था कि एक कूटनीतिक दृष्टिकोण अधिक प्रभावी हो सकता था, जिससे न केवल ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता था, बल्कि क्षेत्र की स्थिरता में भी सुधार किया जा सकता था। इस नीति की आलोचना के बावजूद ट्रंप प्रशासन ने अपने दृष्टिकोण में कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं किया।

ईरान पर सैन्य कार्रवाई की संभावना

ईरान पर संभावित सैन्य कार्रवाई के संदर्भ में, अमेरिका की स्थिति ने हाल के महीनों में महत्वपूर्ण जटिलता उत्पन्न की है। ट्रंप प्रशासन के भीतर विभिन्न विचारधाराएँ और रणनीतियाँ उभरी हैं, जिनमें से कुछ सदस्य ईरान के खिलाफ सैन्य विकल्पों को प्राथमिकता देते हैं, जबकि अन्य इसे उचित रूप से जोखिम से भरा समझते हैं।

इस समय, संधियों और कूटनीतिक बातचीत की कमजोरियों के कारण तनाव भरा वातावरण बनाया गया है। कई प्रतिनिधियों का मानना है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय गतिविधियों का मुकाबला सैन्य कार्रवाई द्वारा ही किया जा सकता है। उनका यह दृष्टिकोण इस बात पर आधारित है कि ईरान की कार्रवाइयाँ न केवल क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा हैं, बल्कि अमेरिका के राष्ट्रीय हितों के लिए भी कट्टरपंथी हो सकती हैं।

लेकिन दूसरी ओर, कुछ सलाहकार और वरिष्ठ अधिकारी हैं जो ऐसी सैन्य कार्रवाई की प्रभावशीलता पर सन्देह व्यक्त करते हैं। उनके अनुसार, युद्ध के परिणाम भयावह हो सकते हैं, न केवल ईरान में मानव जीवन के लिए, बल्कि व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष को जन्म देकर कई अन्य देशों को भी प्रभावित कर सकते हैं। इसके साथ ही, कूटनीतिक प्रयासों की प्रारंभिक विफलता को देखते हुए, वे मानते हैं कि किसी भी सैन्य कार्रवाई का निर्णय लेने से पहले संतुलित और समग्र दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।

इस समय, यह स्पष्ट है कि ट्रंप प्रशासन के सामने ईरान पर सैन्य कार्रवाई की कितनी संभावना है, यह कई अन्य राजनीतिक और कूटनीतिक कारकों पर निर्भर करेगा। ऐसे में, संभावित परिणामों का विश्लेषण करना आवश्यक है ताकि किसी भी निर्णय की विस्तृत और संतुलित समझ विकसित की जा सके।

आंतरिक मतभेद: ट्रंप प्रशासन में विभाजन

ट्रंप प्रशासन में ईरान को लेकर मतभेदों का विश्लेषण करते समय, एक स्पष्ट चित्र उभरकर सामने आता है जहाँ विभिन्न गुटों के पास अलग-अलग दृष्टिकोण हैं। यह विभाजन अमेरिकी विदेश नीति पर गहरा प्रभाव डाल रहा है। एक तरफ, कुछ वरिष्ठ अधिकारी ईरान के प्रति सख्त दृष्टिकोण अपनाने का समर्थन करते हैं, जबकि दूसरी तरफ, कुछ अन्य व्यक्ति कूटनीतिक समाधान पर जोर देते हैं।

इस अंतर्विरोधी दृष्टिकोण के कारण निर्णय लेने की प्रक्रिया में बाधाएँ आती हैं। यदि एक पक्ष सेन्य विकल्पों की पेशकश करता है, तो दूसरा पक्ष आर्थिक प्रतिबंधों और बातचीत के माध्यम से मुद्दों को सुलझाने की बात करता है। यह आंतरिक विभाजन ट्रंप प्रशासन की ईरान नीतियों को जटिल बनाता है, जिससे योजना बनाना और कार्यान्वयन करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। इसके अलावा, यह स्थिति इस बात पर भी निर्भर करती है कि कौन से सलाहकार राष्ट्रपति के करीबी हैं और उनके विचारों पे कितना प्रभाव पड़ता है।

इस विषय पर चर्चा करते समय, यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि ये मतभेद केवल व्यक्तिगत विचारों का परिणाम नहीं हैं, बल्कि ये विभिन्न राजनीतिक, आर्थिक, और सामाजिक कारकों का भी प्रभाव हैं जो प्रशासन के अंतर्गत आते हैं। जब ये अनुशासनहीनताएँ राजनीतिक निर्णयों को प्रभावित करती हैं, तो परिणामस्वरूप न केवल प्रशासन की छवि पर असर पड़ता है, बल्कि संभावित रूप से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अमेरिका की विश्वसनीयता घटती है। इस प्रकार, ईरान पर हमले की संभावनाओं या पीछे हटने के निर्णय पर इन आंतरिक मतभेदों का गहरा असर पड़ता है।

भविष्य की दिशा: संभावित परिणाम और समाधान

अमेरिका और ईरान के संबंधों का भविष्य इस समय अत्यधिक अनिश्चित है। ट्रंप प्रशासन के निर्णय लेने की प्रक्रिया में भीतर की मौजूदा मतभेद यह संकेत देती है कि यह प्रशासन किस ओर बढ़ेगा। यदि प्रशासन युद्ध की ओर बढ़ता है, तो इसके कई व्यापक परिणाम हो सकते हैं। सबसे पहले, एक सैन्य संघर्ष से मध्य पूर्व में स्थिरता में और कमी आ सकती है। दूसरे देशों, खासकर उनके सहयोगियों, जैसे कि इजराइल और सऊदी अरब, पर इसका प्रभाव भी पड़ेगा। इसके अलावा, ईरान के ठोस प्रतिरोध की संभाव्यता इस पर निर्भर करेगी कि अमेरिका किस प्रकार का सैन्य कार्रवाई करता है।

यदि प्रशासन पीछे हटता है, तो संभावित शांति और स्थिरता की दिशा में एक नई दिशा प्रशस्त हो सकती है। कूटनीतिक प्रयासों को प्राथमिकता देकर बातचीत के माध्यम से तनाव को कम करने का एक अवसर हो सकता है। यह न केवल अमेरिका के लिए बल्कि ईरान के लिए भी एक लाभकारी स्थिति बन सकती है। अमेरिका को इस दिशा में जाने के लिए ईरान के साथ उसके परमाणु कार्यक्रम पर वार्ता को बहाल करना होगा। संभावित कूटनीतिक समाधान की चर्चा में सहयोगी देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों की भूमिका को भी शामिल करना अनिवार्य है।

इस संदर्भ में, दोनों देशों के बीच विश्वास निर्माण एक महत्वपूर्ण कार्य हो सकता है। राजनीतिक इच्छाशक्ति और धैर्य द्वारा, अमेरिका और ईरान एक संभावित सहमति की ओर बढ़ सकते हैं जिसका विश्व स्थिरता पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। इसके लिए, लंबे समय तक चलने वाली कूटनीति के रास्ते पर चलना और घटक शक्तियों को विश्वास में लेना आवश्यक होगा। संभावित समाधान की दिशा में यह पहल अत्यधिक महत्वपूर्ण है, जिससे कई जटिलताएं हल की जा सकती हैं।

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