हेल्थ डेस्क। फेफड़ों का कैंसर अब केवल धूम्रपान करने वालों तक सीमित नहीं रह गया है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, बढ़ते वायु प्रदूषण, घर के अंदर मौजूद प्रदूषक तत्व और आनुवंशिक कारणों से बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी इस बीमारी की चपेट में आ रहे हैं जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया। भारत में फेफड़ों के कैंसर के 30 से 50 प्रतिशत मामले गैर-धूम्रपान करने वालों में सामने आ रहे हैं, जो चिंता का विषय है।
फेफड़ों का कैंसर अब केवल धूम्रपान करने वालों तक सीमित नहीं रह गया है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, हाल के वर्षों में बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी इस बीमारी की चपेट में आ रहे हैं जिन्होंने कभी सिगरेट या तंबाकू का सेवन नहीं किया। इसके पीछे बढ़ता वायु प्रदूषण, घर के अंदर मौजूद प्रदूषक तत्व और आनुवंशिक बदलाव प्रमुख कारण माने जा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया में फेफड़ों के कैंसर के 10 से 25 प्रतिशत मामले गैर-धूम्रपान करने वालों में पाए जाते हैं, जबकि भारत में यह आंकड़ा 30 से 50 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। अब यह बीमारी युवा वयस्कों और महिलाओं में भी तेजी से सामने आ रही है। चिकित्सकों के मुताबिक, वाहनों और उद्योगों से निकलने वाला धुआं, हवा में मौजूद PM2.5 कण, सेकेंड हैंड स्मोक, रेडॉन गैस और बिना उचित वेंटिलेशन के ठोस ईंधन से खाना पकाने का धुआं फेफड़ों को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है। वहीं, कुछ मरीजों में EGFR और ALK जैसे जीन में बदलाव भी बीमारी की वजह बनते हैं, जिनकी पहचान आधुनिक जांच से कर प्रभावी टार्गेटेड थेरेपी दी जा सकती है। विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि यदि तीन सप्ताह से अधिक समय तक खांसी, सांस फूलना, खून वाली खांसी, सीने या पीठ में दर्द, बार-बार निमोनिया, बिना कारण वजन घटना, लगातार थकान या आवाज बैठने जैसे लक्षण बने रहें तो तुरंत चिकित्सक से जांच करानी चाहिए। WHO और IARC भी बाहरी वायु प्रदूषण और PM2.5 कणों को कैंसर पैदा करने वाले प्रमुख कारकों में शामिल कर चुके हैं। ऐसे में प्रदूषण वाले दिनों में N95 या FFP2 मास्क पहनना, घर में पर्याप्त वेंटिलेशन रखना, अत्यधिक प्रदूषण के दौरान खुले में व्यायाम से बचना और समय पर जांच कराना फेफड़ों के कैंसर से बचाव के लिए जरूरी माना गया है।
