भोजशाला की “मां वाग्देवी” की असली मूर्ति आखिर कहां है?
नेशनल डेस्क। मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला एक बार फिर चर्चा में है। हाई कोर्ट के फैसले और पुरातात्विक सर्वे के बीच अब भोजशाला से जुड़ी मां वाग्देवी की “असली मूर्ति” को लेकर बहस तेज हो गई है। दावा किया जा रहा है कि यह प्रतिमा फिलहाल लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में सुरक्षित रखी हुई है।
मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला एक बार फिर चर्चा में है। हाई कोर्ट के फैसले और पुरातात्विक सर्वे के बाद यहां पूजा-अर्चना शुरू होने से विवाद फिर सुर्खियों में आया है। इसी बीच उस “असली” वाग्देवी प्रतिमा को लेकर भी बहस तेज हो गई है, जिसे कई लोग भोजशाला की मूल सरस्वती प्रतिमा मानते हैं। बताया जाता है कि यह मूर्ति आज ब्रिटिश म्यूजियम में सुरक्षित रखी हुई है। म्यूजियम की गैलरी नंबर 33 में प्रदर्शित यह प्रतिमा 11वीं सदी की सफेद संगमरमर से बनी मूर्ति है, जिसे “अंबिका” अथवा “वाग्देवी” से जोड़ा जाता है।
कैसी हालत में है प्रतिमा?- ब्रिटिश म्यूजियम के रिकॉर्ड के मुताबिक यह मूर्ति 1034 ईस्वी की मानी जाती है, जब परमार वंश और राजा भोज का शासन था। प्रतिमा को बेहद सुरक्षित और संरक्षित वातावरण में रखा गया है। यह “मध्य और पश्चिम भारत” खंड की एशियाई कलाकृतियों में प्रदर्शित है। मूर्ति पर संस्कृत शिलालेख मौजूद है, जिसमें “वाग्देवी” शब्द का उल्लेख बताया जाता है। इसी आधार पर हिंदू पक्ष इसे भोजशाला की मूल सरस्वती प्रतिमा मानता है।
भारत से लंदन कैसे पहुंची?- ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार यह प्रतिमा 1875 में धार के पुराने अवशेषों के बीच मिली थी। बाद में औपनिवेशिक दौर में इसे करीब 1880 के आसपास ब्रिटेन ले जाया गया। तब से यह लंदन के संग्रहालय में रखी हुई है।
अब क्यों उठ रही वापसी की मांग?- हाल के वर्षों में भारत से बाहर गई प्राचीन मूर्तियों और धरोहरों को वापस लाने की मांग तेज हुई है। कई सामाजिक और धार्मिक संगठन चाहते हैं कि भोजशाला से जुड़ी इस प्रतिमा को भी भारत लौटाया जाए। 2022 में ब्रिटेन के ग्लासगो म्यूजियम्स द्वारा कुछ भारतीय कलाकृतियां लौटाने के फैसले के बाद यह मांग और मजबूत हुई है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?- यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन से जुड़े कला इतिहासकार डॉ. विवेक गुप्ता का कहना है कि ब्रिटिश संग्रहालय कलाकृतियों को अच्छी तरह संरक्षित रखते हैं, लेकिन कई बार वहां के क्यूरेटर भारतीय भाषाओं और सांस्कृतिक संदर्भों को पूरी तरह समझ नहीं पाते। ऐसे में इन मूर्तियों का वास्तविक धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व अधूरा रह जाता है।
सूरज कुमार , सिंगरौली, मध्य प्रदेश
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