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इन 5 मंदिरों का प्रसाद घर लाने से क्यों बचते हैं श्रद्धालु? जानिए क्या कहती हैं धार्मिक मान्यताएं

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By: सूरज कुमार

On: Saturday, June 27, 2026 1:19 PM

धर्म डेस्क। भारत में मंदिरों का प्रसाद भगवान का आशीर्वाद माना जाता है और श्रद्धालु इसे घर ले जाकर परिवार के साथ साझा करते हैं। हालांकि, देश के कुछ प्रसिद्ध मंदिर ऐसे भी हैं, जहां की परंपराओं के अनुसार प्रसाद घर ले जाना शुभ नहीं माना जाता। इन मान्यताओं का आधार स्थानीय धार्मिक विश्वास हैं, जिनका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

भारत में मंदिर केवल पूजा-अर्चना के स्थान ही नहीं, बल्कि आस्था और परंपराओं के केंद्र भी हैं। आमतौर पर श्रद्धालु मंदिर से प्रसाद घर लाकर परिवार के साथ बांटते हैं, लेकिन देश के कुछ प्रसिद्ध मंदिर ऐसे भी हैं, जहां का प्रसाद घर ले जाना धार्मिक मान्यताओं के अनुसार उचित नहीं माना जाता। इन परंपराओं का आधार स्थानीय विश्वास हैं, जिनका कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

इन मंदिरों में प्रसाद घर नहीं ले जाने की है मान्यता-

मेहंदीपुर बालाजी मंदिर (राजस्थान)- दौसा स्थित मेहंदीपुर बालाजी मंदिर में मान्यता है कि प्रसाद या खाद्य सामग्री घर ले जाने से नकारात्मक ऊर्जा साथ आ सकती है। इसलिए श्रद्धालुओं को प्रसाद मंदिर परिसर में ही ग्रहण करने की सलाह दी जाती है।

कामाख्या देवी मंदिर (असम)- नीलाचल पहाड़ी पर स्थित शक्तिपीठ कामाख्या मंदिर में विशेषकर अंबुबाची मेले के दौरान मिलने वाले कुछ प्रसाद को अत्यंत पवित्र माना जाता है। स्थानीय परंपराओं के अनुसार, इन्हें घर ले जाने से बचा जाता है।

कोटिलिंगेश्वर मंदिर (कर्नाटक)- लाखों शिवलिंगों के लिए प्रसिद्ध इस मंदिर में मान्यता है कि भगवान शिव को अर्पित प्रसाद उनके भक्त चंडेश्वर को समर्पित होता है। इसी कारण कई श्रद्धालु इसे घर नहीं ले जाते।

काल भैरव मंदिर (उज्जैन)- भगवान काल भैरव को समर्पित इस मंदिर में मदिरा अर्पित करने की अनूठी परंपरा है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, यहां चढ़ाया गया अनुष्ठानिक प्रसाद मंदिर परिसर से बाहर नहीं ले जाया जाता।

नैना देवी मंदिर (हिमाचल प्रदेश)- बिलासपुर स्थित शक्तिपीठ नैना देवी मंदिर में भी कुछ श्रद्धालु पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार देवी को अर्पित प्रसाद और वस्तुओं को मंदिर परिसर में ही छोड़ना शुभ मानते हैं।

क्या सच में अशुभ होता है?- धार्मिक जानकारों के अनुसार, ये मान्यताएं स्थानीय परंपराओं और आस्था पर आधारित हैं। इनके समर्थन में कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसलिए इन्हें धार्मिक विश्वास के रूप में ही देखा जाना चाहिए। यदि आप इन मंदिरों के दर्शन करने जाएं, तो वहां की परंपराओं और नियमों का सम्मान करना ही सबसे उचित माना जाता है।

सूरज कुमार

सूरज कुमार , सिंगरौली, मध्य प्रदेश
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