नेशनल डेस्क। गर्भावस्था के दौरान अस्थमा की समस्या मां और गर्भ में पल रहे बच्चे दोनों के लिए गंभीर खतरा बन सकती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर प्रेग्नेंसी में अस्थमा को सही तरीके से कंट्रोल न किया जाए तो इससे समय से पहले डिलीवरी, बच्चे का कम वजन और गर्भ में उसके विकास पर असर पड़ सकता है।
गर्भावस्था के दौरान अस्थमा की समस्या मां और बच्चे दोनों की सेहत पर गंभीर असर डाल सकती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, अगर प्रेग्नेंसी में अस्थमा को समय रहते कंट्रोल नहीं किया गया तो समय से पहले डिलीवरी, बच्चे का कम वजन और गर्भ में उसके विकास में रुकावट जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं। डॉक्टरों का कहना है कि अस्थमा के दौरान सांस की नलियां सिकुड़ जाती हैं, जिससे शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो सकती है। इसका सीधा असर गर्भ में पल रहे बच्चे पर पड़ता है। ऑक्सीजन की कमी की वजह से बच्चे की ग्रोथ धीमी हो सकती है और कई मामलों में प्रीमैच्योर बर्थ का खतरा भी बढ़ जाता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि प्रेग्नेंसी के दौरान शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलाव भी अस्थमा की समस्या को बढ़ा सकते हैं। एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन हार्मोन के बढ़ने से सांस फूलना, सीने में जकड़न और थकान जैसी परेशानियां अधिक महसूस हो सकती हैं। अस्थमा के सामान्य लक्षणों में बार-बार खांसी, सांस लेने में तकलीफ, सीने में दर्द और जल्दी थकावट शामिल हैं। ऐसे लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी माना जाता है। डॉक्टरों की सलाह है कि गर्भवती महिलाएं धूल, धुएं और प्रदूषण से दूरी बनाकर रखें। पौष्टिक आहार लें, नियमित जांच कराएं और भारी मेहनत वाले कामों से बचें। साथ ही, जो महिलाएं पहले से अस्थमा की दवा ले रही हैं, वे बिना डॉक्टर की सलाह के दवा बंद न करें, क्योंकि अस्थमा का अनियंत्रित होना ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है।
