नारी डेस्क। महिलाओं के मासिक चक्र के दौरान होने वाले हार्मोनल बदलाव का असर तनाव और शरीर की प्रतिक्रिया पर भी पड़ सकता है। एम्स गोरखपुर के एक अध्ययन में सामने आया है कि मासिक चक्र के अलग-अलग चरणों में तनाव के प्रति महिलाओं की शारीरिक और मानसिक प्रतिक्रिया समान नहीं रहती। ओव्यूलेशन के बाद आने वाले ल्यूटियल फेज में तनाव के दौरान डायस्टोलिक ब्लड प्रेशर यानी नीचे वाला बीपी और चिंता का स्तर अपेक्षाकृत अधिक पाया गया।
महिलाओं के मासिक चक्र के दौरान होने वाले हार्मोनल बदलाव का असर केवल पीरियड्स तक सीमित नहीं रहता, बल्कि तनाव और मानसिक स्थिति पर भी पड़ सकता है। एम्स गोरखपुर के शोध में सामने आया है कि मासिक चक्र के अलग-अलग चरणों में महिलाओं की तनाव के प्रति शारीरिक और मानसिक प्रतिक्रिया अलग-अलग हो सकती है। खासतौर पर ओव्यूलेशन के बाद आने वाले ल्यूटियल फेज में तनाव के दौरान नीचे वाले ब्लड प्रेशर (डायस्टोलिक बीपी) और चिंता के स्तर में अधिक वृद्धि देखी गई।
104 महिलाओं पर हुआ अध्ययन- शोध में 18 से 30 वर्ष की 104 स्वस्थ महिलाओं को शामिल किया गया। सभी का मासिक चक्र सामान्य था। गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं के साथ मासिक चक्र संबंधी समस्या या अन्य स्वास्थ्य संबंधी परेशानी वाली महिलाओं को अध्ययन में शामिल नहीं किया गया। शोधकर्ताओं ने चक्र के अलग-अलग चरणों में महिलाओं का ब्लड प्रेशर, हार्ट रेट और तनाव व चिंता के स्तर का आकलन किया।
ठंडे पानी से जांचा स्ट्रेस रिस्पांस- तनाव के दौरान शरीर की प्रतिक्रिया जानने के लिए कोल्ड प्रेशर टेस्ट किया गया। इसमें हाथ को कुछ समय के लिए ठंडे पानी के संपर्क में रखा गया और इस दौरान ब्लड प्रेशर तथा अन्य शारीरिक प्रतिक्रियाओं को रिकॉर्ड किया गया। अलग-अलग चरणों के परिणामों की तुलना करने पर ल्यूटियल फेज में तनाव के प्रति अधिक शारीरिक और मानसिक प्रतिक्रिया के संकेत मिले।
इलाज और स्ट्रेस मैनेजमेंट में उपयोगी हो सकती है जानकारी- शोधकर्ताओं के अनुसार, महिलाओं में तनाव और चिंता का आकलन करते समय मासिक चक्र के चरण को भी ध्यान में रखना उपयोगी हो सकता है। इससे भविष्य में महिलाओं के लिए स्ट्रेस मैनेजमेंट और उपचार की रणनीतियों को उनकी स्थिति के अनुरूप समझने में मदद मिल सकती है। हालांकि, शोध के निष्कर्ष यह साबित नहीं करते कि ल्यूटियल फेज सीधे हाई ब्लड प्रेशर का कारण बनता है। इस संबंध को बेहतर तरीके से समझने के लिए बड़े स्तर पर आगे शोध की जरूरत होगी।
कई विभागों ने मिलकर किया शोध– यह अध्ययन एम्स गोरखपुर के फिजियोलॉजी, मनोचिकित्सा, नर्सिंग और माइक्रोबायोलॉजी विभागों के शोधकर्ताओं ने संयुक्त रूप से किया। शोध को International Journal of Physiology, Pathophysiology and Pharmacology में प्रकाशित किया गया है। अध्ययन आईसीएमआर के शॉर्ट टर्म स्टूडेंटशिप प्रोग्राम के तहत किया गया था।