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वृंदावन का रहस्यमयी ‘निधिवन’: आस्था, लोककथाओं और दावों के बीच जन्माष्टमी पर श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र

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By: सूरज कुमार

On: Wednesday, September 2, 2026 8:43 AM

वृंदावन।  अगर आप इस जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण की नगरी वृंदावन जाने का प्लान बना रहे हैं, तो उत्तर प्रदेश के इस पवित्र शहर के बीचों-बीच बसे ‘निधिवन’ जाना बिल्कुल न भूलें। हरे-भरे पेड़ों और पौराणिक कथाओं से घिरा निधिवन भारत की सबसे रहस्यमयी जगहों में से एक माना जाता है।

जन्माष्टमी के पावन अवसर पर यदि आप श्रीकृष्ण की नगरी वृंदावन की यात्रा का विचार कर रहे हैं, तो उत्तर प्रदेश के इस पवित्र शहर के हृदय स्थल में बसा ‘निधिवन’ आपके लिए एक अनूठा और अद्भुत अनुभव हो सकता है। घने, हरे-भरे वृक्षों से आच्छादित यह स्थान देश के सबसे रहस्यमयी धार्मिक स्थलों में गिना जाता है।

रंग महल और रात के विश्राम की अनोखी परंपरा- निधिवन परिसर में स्थित ‘रंग महल’ मंदिर को लेकर मान्यता है कि यहाँ स्वयं भगवान श्रीकृष्ण अपनी प्रिय राधा रानी का श्रृंगार करते हैं। मंदिर के पुजारी प्रतिदिन शाम की आरती के पश्चात रंग महल में राधा-कृष्ण के विश्राम के लिए सजाया हुआ बिस्तर, एक जग में पवित्र जल, दातून, साड़ी, चूड़ियां, पान के पत्ते और चार लड्डू (प्रसाद) रखते हैं। इसके बाद वन के मुख्य द्वार बंद कर दिए जाते हैं। स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं का दावा है कि अगली सुबह जब कपाट खोले जाते हैं, तो बिस्तर अस्त-व्यस्त मिलता है और रखी सामग्री का उपयोग किया हुआ प्रतीत होता है।
पेड़ों की अद्भुत बनावट और पौराणिक मान्यताएं- निधिवन के पेड़ों की बनावट सामान्य वृक्षों से बिल्कुल भिन्न है। यहाँ के पेड़ आकार में छोटे, खोखले और जोड़ों में आपस में लिपटे हुए हैं। आमतौर पर पेड़ों की शाखाएं ऊपर की ओर बढ़ती हैं, लेकिन निधिवन में ये शाखाएं नीचे ज़मीन की ओर झुकती हैं। श्रद्धालुओं का मानना है कि रात के समय यह प्रत्येक जोड़ा गोपी और उसकी सखी का रूप धारण कर लेता है। लोककथाओं के अनुसार, कृष्ण की अन्य गोपियों के साथ छेड़-छाड़ से नाराज होकर राधा रानी ने इस वन को श्राप दिया था। मान्यता है कि इसी श्राप के कारण सूर्यास्त के बाद यहाँ पशु, पक्षी या कीड़े-मकोड़े भी नहीं ठहरते। शाम ढलते ही संपूर्ण परिसर को खाली करा दिया जाता है।
बदलता दृष्टिकोण: आस्था बनाम तर्क- जहाँ एक ओर देश-विदेश से आने वाले लाखों श्रद्धालु इसे अटूट आस्था और प्रभु की लीला से जोड़कर देखते हैं, वहीं आधुनिक शिक्षा और तकनीकी दौर में कई स्थानीय नागरिकों व पर्यटकों का दृष्टिकोण बदला है। कुछ लोगों का मानना है कि इन मान्यताओं का उपयोग स्थानीय ट्रस्ट और पुजारियों द्वारा पर्यटकों को आकर्षित करने और प्रचार प्रसार के लिए किया जाता है।

 

सूरज कुमार

सूरज कुमार , सिंगरौली, मध्य प्रदेश
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